Monday, December 31, 2018

2019 में मंडल-कमंडल महा-मुक़ाबला पार्ट-2 होगा?

25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ मंदिर में पूजा करने के बाद विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी जिस 'राम रथ' को लेकर देश भर की यात्रा पर निकले थे, उस पर काली दाढ़ी वाले एक व्यक्ति भी सवार नज़र आते थे.

आडवाणी के रथ पर सवार वही स्वयंसेवक करीब 24 साल के सियासी सफ़र के बाद 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने.

नरेंद्र मोदी तब आडवाणी के रथ पर सवार थे, लेकिन अब वे सत्ता के शीर्ष पर हैं, इसलिए रथ पर सवारी की ज़िम्मेदारी अभिभावक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने संतों-महंतों को सौंप दी है.

वैसे भी अयोध्या का आंदोलन विश्व हिंदू परिषद चलाती रही है. सिर्फ़ अगस्त 1990 से 6 दिसंबर 1992 तक आडवाणी ने इसकी कमान संभाली थी.

सितंबर 1990 में आडवाणी की रथ यात्रा शुरू होने से एक महीने पहले देश में एक और बड़ी घटना हुई थी, अगस्त महीने में तब के प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने की मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने का ऐलान किया था. दस साल धूल खा रही बीपी मंडल की रिपोर्ट ने राजनीति में भूचाल ला दिया.

वीपी सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार दो बैसाखियों पर टिकी थी, एक ओर वामपंथी और दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी, दोनों उनकी सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे.

मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने की वीपी सिंह की घोषणा ने बीजेपी को सकते में डाल दिया, लेकिन बीजेपी ने राजीव गांधी की तरह तत्काल प्रतिक्रिया नहीं दी.

बीजेपी के नेता देश की राजनीति में जाति की पेचीदगियों को समझते हैं, और तब भी समझते थे. राजीव गांधी ने तो वीपी सिंह की तुलना जिन्ना से करते हुए, मंडल आयोग की सिफ़ारिशों का ज़ोरदार विरोध किया.

लेकिन मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के दूरगामी राजनीतिक असर की काट के लिए बीजेपी ने 'हिंदू एकता' का नारा देते हुए राम मंदिर का आंदोलन तेज़ कर दिया.

1990 के अंतिम चार महीनों में मंडल विरोध और मंदिर आंदोलन से पूरे देश का राजनीतिक माहौल गरम गया.

पांच हफ़्ते तक 'बाबर की औलादों' को धमकाते हुए, हर दिन अलग-अलग जगहों पर छह जनसभाएं करते हुए, तनावपूर्ण सांप्रदायिक माहौल में जब आडवाणी का रथ बिहार पहुंचा, तो सिर्फ़ 8 महीने पहले मुख्यमंत्री बने लालू यादव ने उन्हें सिंचाई विभाग के मसानजोर गेस्ट हाउस में बंद करा दिया.

जनता दल के नेता लालू यादव की इस कार्रवाई का असर ये हुआ कि बीजेपी ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया, बहुमत खोने के बाद नवंबर 1990 में उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा.

नौ नवंबर 1990 को वीपी सिंह ने कहा कि वे सामाजिक न्याय के पक्ष में, और सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लड़ाई में अपनी गद्दी कुर्बान कर रहे हैं.

मार्के की बात ये है कि बीजेपी ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के विरोध में वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस लेने की बात तो दूर, कभी उसका खुलकर विरोध भी नहीं किया, बल्कि हमेशा ही जातियों में बंटे समुदायों को हिंदू धर्म के नाम पर जोड़ने की राजनीति की, जो मुसलमानों की बात किए बिना पूरी नहीं हो पाती.

इसी टकराव को मीडिया ने मंडल बनाम कमंडल का नाम दिया, कई सालों तक सतह के नीचे दबे रहने के बाद यह टकराव एक बार फिर उभरता दिख रहा है जो 2019 के चुनाव में ज़ोरदार ढंग से सामने आ सकता है.

इन दो धाराओं का टकराव ज़रूर होगा, भले मोदी अभी राम मंदिर के मुद्दे पर आक्रामक नहीं हैं लेकिन आगे-आगे देखिए होता है क्या. मंदिर के मामले को गरमाने का काम अभी संघ के दूसरे सिपाही कर रहे हैं.

मोदी अभी दूसरी 'दवाइयों' का असर परखेंगे उसके बाद ज़रूरत के हिसाब से अयोध्या अस्त्र का इस्तेमाल करेंगे.

वैसे इस चुनाव में नरेंद्र मोदी खुद अयोध्या से कम बड़ा मुद्दा नहीं हैं.

हिंदुत्व बनाम सामाजिक न्याय के टकराव के समानांतर, एक और टकराव साफ़ देखने को मिलेगा. वह होगा मोदी बचाओ बनाम मोदी हटाओ.

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