चीन और पाकिस्तान की महत्वाकांक्षी परियोजना चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर यानी सीपीईसी की जब शुरुआत हुई थी तो इसे पूरी तरह से द्विपक्षीय रखने की बात कही गई थी.
इसमें कई बार दूसरे देशों को आमंत्रित भी किया गया तो इस बात को लेकर दृढ़ता रही कि परियोजना पर नियंत्रण चीन और पाकिस्तान का ही रहेगा.
सीपीईसी के अनुबंधों के अनुसार चीन और पाकिस्तान के अलावा दूसरे देश इससे जुड़ी परियोजनाओं में शामिल हो सकते हैं लेकिन नीति-निर्माण और इसे लागू करने के फ़ैसलों में किसी तीसरे देश का दख़ल नहीं होगा.
अतीत में पाकिस्तान ईरान को इसमें शामिल होने का निमंत्रण दे चुका है. ऐसे में सऊदी अरब को इसमें शामिल होने के लिए बुलाना कोई नई बात नहीं है.
कहा जा रहा है कि सऊदी पाकिस्तान में बलूचिस्तान प्रांत के ग्वादर पोर्ट में एक अहम साझेदार बन लंबी अवधि की रणनीति पर काम करने का विचार कर रहा है.
कई विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी ऐसा कर अपनी विदेश नीति में प्रयोग करने के मूड में है.
ज़ाहिर है सीपीईसी में सऊदी और यूएई की एंट्री होती है तो परियोजना के ढांचा में परिवर्तन होगा. सभी देशों के अपने भूराजनैतिक उद्देश्य और हित हैं.
इस परियोजना से चीन की ऊर्जा सुरक्षा जुड़ी हुई है. चीन को वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के एक चौथाई ऊर्जा की ज़रूरत है और इसके लिए पेट्रोलियम संपन्न देश काफ़ी अहम हैं.
इस योजना में मध्य-पूर्व से प्रस्तावित तेल पाइपलाइन से चीन का बड़ा हित जुड़ा हुआ है लेकिन इसकी जटिलता का अंदाज़ा सबको है. ईरान और खाड़ी के देशों के विवाद की उपेक्षा इस मामले में नहीं की जा सकती है.
चीन के सऊदी अरब और यूएई से भी बहुत अच्छे संबंध हैं. अगर इसमें सऊदी और यूएई की एंट्री होती है तो चीन के प्रभाव कम होने की बात कही जा रही है. सीपीईसी में ज़्यादा देश शामिल होंगे तो चीन के एकाधिकार पर असर पड़ना लाज़िमी है.
इसमें चीन के लिए तीसरी दिक़्क़त ये है कि अमरीका से सऊदी और यूएई के बीच बहुत अच्छे रिश्ते हैं जबकि चीन को अमरीका अपना सबसे कट्टर प्रतिद्वंद्वी मानता है.
वॉशिंगटन स्थित जियोस्ट्रैटिजिक कंस्लटेंसी गल्फ़ स्टेट एनलिटिक्स के थियोडोर कारसिक ने द डिप्लोमैट से कहा है, ''सऊदी का पाकिस्तान में निवेश दोनों देशों के अच्छे होते संबंधों का परिचायक है. सऊदी आतंक विरोधी इस्लामिक सैन्य बल भी बनाने की आकांक्षा रखता है.''
सीपीईसी में नई प्रगति को लेकर इसके एक सकारात्मक पहलू की भी चर्चा हो रही है. ग्वादर अब कई देशों के लिए कारोबार का केंद्र बनने जा रहा है और यह उस अफ़वाह के उलट है कि ग्वादर में चीन सैन्य ठिकाना बनाने जा रहा है.
पाकिस्तान में सीपीईसी को लेकर कई तरह के विवाद बढ़ रहे थे और इसमें चीन की नकारात्मक छवि बन रही थी. ऐसे में सऊदी और यूएई के आने से पाकिस्तान के लिए अच्छा साबित हो सकता है.
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के बारे में साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा है, ''इमरान ख़ान चाहते हैं कि चीन सीपीईसी में सऊदी अरब को भी उतना ही विश्वसनीय साथी बनाए जितना पाकिस्तान है. ख़ान सऊदी और यूएई को इस परियोजना में शामिल कर चीन के प्रभाव को संतुलित करना चाहते हैं.''
पाकिस्तान के साथ समस्या ये है कि वो सऊदी के साथ ईरान को नाराज़ कर नहीं जाना चाहता है और दोनों को एक साथ साधना भी आसान नहीं है.
पाकिस्तान लंबे समय से कोशिश कर रहा है कि वो ईरान और सऊदी अरब के बीच संतुलन बनाकर चले, लेकिन संतुलन की नीति हमेशा मुश्किल होती है.
पाकिस्तान के बारे में कहा जाता है कि अगर राजनीतिक और सामाजिक रूप से सबसे ज़्यादा किसी भी देश का प्रभाव है तो वो है सऊदी अरब.
सऊदी में पाकिस्तान के क़रीब 27 लाख लोग काम करते हैं. ये पाकिस्तानी कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री और छोटी-मोटी नौकरियों में हैं. ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान सऊदी के क़रीब रहा है और इसे अमरीका, ब्रिटेन ने बढ़ावा दिया है.
पाकिस्तान को भी इस बात का अहसास है कि उसे सऊदी से सबसे ज़्यादा आर्थिक मदद मिलती है. यहां तक कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार प्रोजेक्ट में भी सऊदी ने निवेश किया है.
पाकिस्तान मीडिया में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान की संभावित यात्रा को लेकर काफ़ी अटकलबाजी है.
अख़बारों में अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि क्राउन प्रिंस कितनी बड़ी रक़म के निवेश की घोषणा करेंगे. कहा जा रहा है कि प्रिंस सलमान इस महीने ही पाकिस्तान पहुंचने वाले हैं.
डॉन समेत कई अहम अख़बारों का कहना है कि सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ 10 अरब डॉलर के एमओयू पर हस्ताक्षर कर सकता है.
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