Wednesday, May 8, 2019

गढ़चिरौली जैसी घटनाओं को माओवादी कैसे अंजाम दे पाते हैं

बीते एक मई को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में एक माओवादी हमले में सुरक्षा बलों के 15 जवानों और एक ड्राइवर की मौत हो गई थी.

माओवादियों ने सुरक्षा बलों के एक वाहन को बारूदी सुरंग के ज़रिए निशाना बनाया था. घटना जिले के कुरखेड़ा तालुका के पास हुई थी.

यह मानक संचालन प्रक्रियाओं (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर/एसओपी) के उल्लंघन का एक उदाहरण है, जिसे सेना विरोधी अभियानों से बचने के लिए पालन करना होता है.

यह कोई पहला मामला नहीं है जब एसओपी का उल्लंघन हुआ हो, इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आए हैं.

गढ़चिरौली की घटना में मारे गए जवान क्विक रिस्पॉन्स टीम के सदस्य थे. सीआरपीएफ जवानों की ड्यूटी चुनावों में लगने के बाद उन्हें यहां बुलाया गया था.

जिला पुलिस के अनुसार, उत्तर गढ़चिरौली में पुरदा पुलिस थाने के क्षेत्राधिकार में माओवादी गतिविधियां पिछले कुछ दिनों में बढ़ गई थीं.

छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़कर 11 अप्रैल को गढ़चिरौली में लोकसभा चुनाव के लिए हुआ मतदान शांतिपूर्ण रहा था.

यह वो समय है जब ग्रामीण आदिवासी तेंदु पत्तों को जंगलों से चुनते हैं. अब कई अधिकारियों का मानना है कि घटना के इलाक़े में तैनात सीआरपीएफ के जवान बेहतर तरीके से गश्त लगा सकते थे.

एक मई की घटना कई ऐसी पुरानी यादों को ताज़ा करती है. साल 2012 में सीआरपीएफ़ की एक टीम को ऐसे ही एक विस्फोट में उड़ा दिया गया था, जिसमें 12 लोग मारे गए थे और 28 घायल हुए थे.

यह घटना धनोरा के पास हुई थी. जवानों की टीम किराने के सामान और बर्तनों के साथ गट्टा जा रही थी, जहां आदिवासियों के बीच इनका वितरण महानिदेशक के. विजय कुमार के हाथों किया जाना था.

साल 2016 में अहेरी में कम तीव्रता वाले एक विस्फोट में एक जीप को निशाना बनाया गया था, जिसमें तीन पुलिसकर्मियों की मौत हो गई थी.

एसओपी का उल्लंघन क्यों हुआ, जवानों की गश्ती के वक्त इसका पालन क्यों नहीं किया गया, कहां चूक हुई, इनका जवाब ना महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक सुबोध कुमार जायसवाल दे रहे हैं और ना ही गढ़चिरौली के एसपी संजीव बल्कावडे.

मारे गए जवानों को पुरादा पुलिस स्टेशन क्षेत्र के दादापुर नाम के गांव में भेजा गया था, जहां घटना वाले दिन ही 30 वाहनों को संदिग्ध माओवादियों ने जला दिया था. ये वाहन सड़क निर्माण कार्यों में लगाए गए थे.

माओवादियों को पता था कि आगजनी के बाद पुलिस की एक टीम को चार संभावित मार्गों में से एक के जरिए घटनास्थल पर भेजा जाएगा. आईईडी ब्लास्ट के बाद गोलीबारी की घटना नहीं हुई, जिससे यह पता चलता है कि इलाक़े में भारी संख्या में सशस्त्र माओवादियों की मौजूदगी नहीं थी.

इस तरह के संघर्ष पर कई अध्ययन किए गए हैं, जिसमें माओवादियों द्वारा विस्फोटकों के इस्तेमाल के तरीके और सुरक्षा बलों द्वारा उसे नष्ट करने के उपाय सुझाए गए हैं, फिर भी उन उपायों और मानक एसओपी का उल्लंघन समझ से परे है.

आईईडी उन जंगलों और स्थानों पर लगाए जाते हैं जहां इसका लगातार पता लगाना और नष्ट करना संभव नहीं होता है. यह मध्य भारत के जंगलों में माओवादियों के ख़िलाफ़ अभियानों के समक्ष एक बड़ी चुनौती है.

छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री द्वारा राज्य विधान सभा के समक्ष पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक साल 2010 से 2018 के मध्य तक सुरक्षाबलों ने 1250 से अधिक आईईडी का पता लगाया था.

पेश किए आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में यहां आईईडी विस्फोटों में 66 सुरक्षाकर्मी मारे गए और 205 घायल हुए थे.

आईईडी का इस्तेमाल आमतौर पर सड़क के किनारे विस्फोटक के रूप में किया जाता है. मध्य भारत में सुरक्षकर्मियों को निशाना बनाने के लिए माओवादियों ने बड़े पैमाने पर आईईडी का सहारा लिया है.

सुरक्षाबलों की नियमावली के मुताबिक इसे राष्ट्रीय राजमार्गों, सड़कों, शिविरों के आसपास झाड़ियों में या फिर जमीन के नीचे लगाया जाता है.

सीआरपीएफ की आंतरिक रिपोर्ट से पता चलता है कि नक्सल अभियान में मारे गए 70 फ़ीसदी सुरक्षाकर्मी आईईडी और बारुदी सुरंगों के शिकार होते हैं.

यही कारण है कि साल 2012 में सीआरपीएफ ने पुणे में आईईडी प्रबंधन संस्थान स्थापित किया, जहां विस्फोटकों के पता लगाने, उसे बेअसर और नष्ट करने के लिए सैनिकों को प्रशिक्षित किया जाता है.

माओवादियों ने देशभर में कई हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया है. साउथ एशिया टेरेरिज्म पोर्टल (एसटीएपी) के जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक गढ़चिरौली की घटना 53वीं हिंसक घटना है, जिसे माओवादियों ने अंजाम दिया है.

साल 2019 में अब तक ऐसी हिंसक घटनाओं में कम से कम 107 लोग मारे गए हैं. पिछले पांच वर्षों (अप्रैल 2014 से अप्रैल 2019 तक) में देशभर में 942 नक्सली या माओवादी हमलों को अंजाम दिया गया है.

साल 2010 में इन घटनाओं की संख्या 2213, साल 2011 में 1760, साल 2012 में 1136 और साल 2013 में 1415 थी.

घने जंगलों वाले जनजातीय ज़िले गढ़चिरौली में पिछले दस सालों में माओवादियों का प्रभुत्व कम होता नज़र आ रहा है, ख़ासकर उत्तरी हिस्सों में. यह बात पुलिस के कब्ज़े में आए सीपीआई (माओवादी) के आंतरिक दस्तावेज़ों से पता चलती है.

एसटीएपी ने 2018 के अपने आकलन में कहा था कि पुलिस ने पिछले सालों में जिन हिस्सों में सफलता हासिल की है, उसे बरकरार रखना चाहिए और माओवादी फिर न उभरें, इसके लिए चौकस रहना चाहिए.

जिन इलाक़ों में उनका प्रभाव रहा होता है, वहां पर अगर राजनीतिक और प्रशासनिक शून्य बन जाता है तो बचे हुए गुरिल्ला लड़ाके फिर से राजनीतिक गतिविधियों के माध्यम से वापसी करने के लिए जाने जाते हैं.

एसटीएपी ने जो आँशिक जानकारी जुटाई है, उसके मुताबिक 2018 में माओवादी हिंसा में महाराष्ट्र में 58 जानें गईं जिनमें पांच आम नागरिक, दो सुरक्षा बल और 51 माओवादी थे.

2017 में कुल 27 मौतें हुईं जिनमें सात आम लोग, तीन सुरक्षा बलों के जवान और 15 माओदावी थे. इस साल 3 फरवरी तक माओवाद से संबंधित घटनाओं में आठ जानें गई हैं. इनमें सात आम नागरिक और एक माओवादी है.

इन मौतों पर सरसरी निगाह दौड़ाएं तो संकेत मिलते हैं कि 2018 में 2017 की तुलना में माओवादियों की मौत में 240 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जबकि सुरक्षा बलों की मौत में 33.33 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है.

No comments:

Post a Comment