Monday, March 25, 2019

छत्तीसगढ़: कांग्रेस राज में अडानी को कोयला खदान का ठेका, उठे सवाल

छत्तीसगढ़ के कोरबा ज़िले में गिधमुड़ी और पतुरिया कोयला खदान को कांग्रेस पार्टी की सरकार ने गौतम अडानी की कंपनी को सौंपने का फ़ैसला किया है. अडानी की कंपनी कुछ दूसरी कंपनियों के साथ मिल कर इस कोयला खदान में एमडीओ यानी माइन डेवलपर कम ऑपरेटर के तौर पर कोयला खनन का काम करेगी.

विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस पार्टी एमडीओ के तौर पर कोयला खनन का विरोध करती रही है और इसे बड़ा भ्रष्टाचार बताती रही है.

यहां तक कि पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी कोयला खनन के इलाके में जा कर ग्रामसभा के मुद्दे पर राज्य और केंद्र की भाजपा सरकार को घेरने का काम करते रहे हैं.

लेकिन अब सरकार में आने के बाद छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी ने भी कोयला खनन के लिए एमडीओ का रास्ता अपनाते हुए अडानी को ही चुना है.

छत्तीसगढ़ स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड के अध्यक्ष और निदेशक शैलेंद्र कुमार शुक्ला ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "इस मामले में निविदा आमंत्रित की गई थी और इसकी सारी प्रक्रिया पूरी कर ली गई है. अडानी और उसकी सहयोगी कंपनियों को इसके लिये योग्य पाया गया है."

अडानी को एमडीओ आधार पर गिधमुड़ी और पतुरिया कोयला खदानों को देने का फ़ैसला ऐसे समय में किया गया है, जब कुछ समय पहले ही पड़ोसी ज़िले सरगुजा में परसा कोयला खदान अडानी समूह को इसी तरह एमडीओ के तौर पर दिए जाने के बाद से विवाद चल रहा है.

आरोप है कि हसदेव अरण्य इलाके के इस कोयला खदान के लिए पंचायत क़ानून के तहत ग्रामसभा की सहमति के बिना फ़र्ज़ी काग़ज़ों के सहारे भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनाई गई है. यहां तक कि कोयला उत्खनन के लिए वन अधिकार क़ानून के तहत मिले अधिकार को भी सरकार ने रद्द कर दिया.

एक के बाद एक, कुल पांच कोयला खदानें अडानी को दी गई हैं.

जन संगठनों का आरोप है कि इन खदानों में कोयला उत्खनन का सिलसिला शुरू होने से हसदेव अरण्य के लगभग पौने दो लाख हेक्टेयर में फैले घने जंगलों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा.

यह वही इलाका है, जिसे यूपीए सरकार के कार्यकाल में वन्यजीवों और श्रेष्ठतम पर्यावरणीय पारिस्थितकी के कारण 'नो गो एरिया' घोषित करते हुए यहां कोयला उत्खनन पर रोक लगा दिया गया था. लेकिन बाद में यह रोक हटा ली गई और अब एमडीओ के सहारे फिर से खनन का रास्ता साफ़ हो गया है.

2014 में कोल खदानों के आवंटन में भ्रष्टाचार के आरोप के बाद जब उच्चतम न्यायालय ने 214 कोयला खदानों का आवंटन रद्द कर दिया, तब केंद्र सरकार ने दावा किया कि इन कोयला खदानों का आवंटन अब नीलामी से किया जाएगा.

हालांकि इसके बाद केवल 27 प्रतिशत कोयला खदानों की ही नीलामी हो पाई और बाद में एक-एक कर अधिकांश कोयला खदानों को सार्वजनिक क्षेत्र या सरकारी कंपनियों को आवंटित कर दिया गया.

लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने कोयला खनन में अनुभव का हवाला दे कर अंततः इन खदानों को निजी कंपनियों को एमडीओ यानी माइन डेवलपर कम ऑपरेटर बना कर सौंप दिया.

इस एमडीओ को ही तमाम तरह की पर्यावरण स्वीकृतियां लेने, भूमि अधिग्रहण करने, कोयला खनन और परिवहन करने समेत तमाम काम करने होते हैं. यानी कहने को तो खदान सरकार या सार्वजनिक क्षेत्र को आवंटित होती है लेकिन खदान पर पूरा नियंत्रण निजी कंपनी का ही होता है.

छत्तीसगढ़ में अडानी समूह के पास एमडीओ के तौर पर पहले से ही चार कोयला खदानें थीं, अब इसमें गिधमुड़ी और पतुरिया कोयला खदान भी जुड़ने वाली हैं.

दिलचस्प ये है कि किसी भी एमडीओ की दर और दूसरी शर्तों को आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया है. अडानी और राज्य सरकार, दोनों ही इसके 'संवेदनशील' और 'निजता के अधिकार के भंग' होने का दावा करके इससे बचती रही हैं.

हालत ये है कि एमडीओ की दर और दूसरी शर्तों को सूचना के अधिकार में उपलब्ध कराए जाने के संसद में सरकार के दावे के बाद भी छत्तीसगढ़ में राज्य सूचना आयोग भी इसे उपलब्ध करा पाने में असफल साबित हुआ है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला कहते हैं, "छत्तीसगढ़ में एक के बाद एक कोल खदानें अडानी को दी जा रही हैं. जंगल और आदिवासी हाशिये पर रख दिये गए हैं और कॉरपोरेट के लाभ के लिए सरकार भी इस साजिश में शामिल है. लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि भाजपा के शासनकाल के बाद यह सब अब कांग्रेस की सरकार में भी जारी है."

आलोक शुक्ला का कहना है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जब विपक्ष में थे तो उन्होंने एमडीओ के ख़िलाफ़ लगातार आवाज़ उठाई थी. लेकिन अब एमडीओ को रद्द करने और इसकी जांच के बजाय नए एमडीओ बनाने से कांग्रेस पार्टी की सरकार संदेह के घेरे में आ गई है.

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